तुम्हारी गली से गुज़रना
तुम्हारी गली से गुज़रना भी
मेरे लिए
सुकून लिए होता है।
जैसे किसी भीड़-भरी दुनिया में
अचानक
एक परिचित ख़ामोशी मिल जाए।
मैं जानता हूँ
तुम खिड़की पर नहीं होगी हर बार,
पर हवा में तुम्हारी आहट रहती है।
दीवारों पर धूप का रंग
कुछ और नरम हो जाता है।
उस मोड़ पर आते ही
कदम अपने-आप धीमे पड़ जाते हैं
मानो सड़क भी चाहती हो
कि मैं थोड़ा और ठहरूँ।
तुम्हारे दरवाज़े के पास से गुज़रते हुए
दिल की धड़कन
बिना वजह सलीके से चलने लगती है,
जैसे उसे मालूम हो
कि यह इलाक़ा तुम्हारा है।
कोई नाम पुकारे न पुकारे,
कोई पर्दा हिले न हिले,
फिर भी
एक अनकहा-सा सलाम
हम दोनों के बीच
आ-जा चुका होता है।
तुम्हारी गली से गुज़रना
मिलना नहीं है,
पर बिछड़ना भी नहीं।
यह बस इतना-सा एहसास है
कि इस शहर में
एक जगह ऐसी है
जहाँ से होकर निकलूँ
तो दिल
थोड़ा हल्का हो जाता है
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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