मैं सिगरेट था, वो अग्नि - एक
मैं सिगरेट था
सूखा, भरा हुआ तम्बाकू की कसैली यादों से,
रख दिया गया था किसी कोने में,
कि कोई जलाए… और ख़त्म कर दे।
वो आई
हवा नहीं थी वो,
वो अग्नि थी।
उसकी आँखों में आग थी,
होंठों पर चिनगारियाँ,
और उंगलियाँ… जैसे किसी तपस्वी की ज्वाला को थामे हुए।
उसने मुझे चूमा नहीं
मुझे सुलगा दिया।
धीरे-धीरे,
जैसे कोई आत्मा का मोक्ष ले रहा हो।
हर कश में,
मैं उसका स्पर्श था,
वो मेरी राख थी।
मैं जलता रहा
शब्दों की तरह,
शरीर की तरह,
प्रेम की तरह,
विरह की तरह।
और जब मैं खत्म हुआ
वो मुस्कराई…
जैसे अग्नि कहती हो,
“मैंने तुझे नहीं जलाया
तू तो जलने के लिए ही बना था।”
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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