जब उसने लाइटर से मेरी सिगरेट सुलगाई,
वो पल हवा में कहीं थम गया था।
ना आग सिर्फ तम्बाकू को लगी थी,
ना धुआँ सिर्फ होंठों से निकला था।
उसके हाथ काँपे नहीं,
पर मेरी उँगलियाँ थोड़ी देर ठिठक गईं।
शायद वज़ह वो लौ नहीं थी
वज़ह उसका पास होना था,
इतना पास कि साँसों में
उसके साँसों की छुअन घुल गई।
लाइटर की छोटी सी चिंगारी में
इतनी कहानियाँ कैसे छुपी थीं?
शायद वो भी जानती थी,
या शायद सिर्फ मैं ही जला था।
उसकी आँखों में हल्की सी शरारत थी,
जैसे कह रही हो
"लो, अब खुद को भी धीरे-धीरे जलाओ।"
मैं मुस्कराया नहीं उस वक़्त,
पर अंदर कुछ फूंक मार रहा था,
जैसे कोई पुराना ख़्वाब/अचानक धुएँ में दिख गया हो।
उस लाइटर की लौ में
न इश्क़ था, न इंकार,
बस एक छोटा सा इशारा था
कि अब सब कुछ बदल सकता है,
या शायद कुछ भी नहीं।
और सिगरेट के साथ/मैं भी सुलगता रहा —
धीरे-धीरे,/उसी पल में,
जहाँ एक लड़की ने
मेरी सिगरेट सुलगाई थी,
और मुझे भी।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,
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