पलाश का जलता जंगल
दूर तक फैला है
पलाश का जलता जंगल —
जैसे धरती ने
अपनी छाती पर आग सजा ली हो।
ये लपटें विनाश की नहीं,
संघर्ष की हैं
हर लाल फूल
एक अनकही जिद है
जीवित रहने की।
धूप जब उन पर गिरती है,
तो रंग और गहरा हो जाता है,
मानो प्रेम ने
दर्द को भी स्वीकार लिया हो।
इस अग्नि में
कोई राख नहीं,
सिर्फ़ अस्तित्व की चमक है
जो कहती है,
“मैं जलता हूँ,
इसलिए हूँ।”
पलाश का यह जंगल
डराता नहीं,
सिखाता है
कि जीवन कभी-कभी
फूल बनकर भी
आग ही होता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
बेहद सुंदर और गहन भाव समेटे अर्थपूर्ण कृति सर। आपकी रची सभी कविताएं एक से बढ़कर एक हैं।
ReplyDeleteसादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार २७ फरवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
aabahr - koshish zaroor karoonga rahne kee
Deleteसुंदर
ReplyDeleteबहुत सुंदर
ReplyDeleteबहुत सुंदर
ReplyDeleteजीवन कभी-कभी
ReplyDeleteफूल बनकर भ
आग ही होता है।
- सार्थक संदेश देती सुन्दर रचना
अति सुंदर
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