मैं, तेरी परछाई और मौसम
मैं खड़ा हूँ उस किनारे पर,
जहाँ मौसम अपने रंग बदल रहा है।
तेरी परछाई मेरे कदमों के साथ चलती है,
हर हवा में तेरे होने का अहसास लाती है।
बारिश की बूंदें मेरे चेहरे पर गिरती हैं,
पर मैं भीगता नहीं,
क्योंकि तेरी परछाई
मुझे अपने अंदर की गर्मी देती है।
हर पतझड़ की पत्तियों में
तेरी मुस्कान की झलक है,
और हर ठंडी हवा
तेरे खामोश फुसफुसाहट की गूँज है।
मैं और मौसम
तेरी यादों को सजाते हैं,
जैसे कोई चित्रकार अपने रंगों से
अदृश्य चित्र बनाता है।
और मैं,
तेरी परछाई के साथ
हर मौसम की कहानी सुनता हूँ,
हर बदलाव में तेरे एहसास को पाता हूँ।
तुम दूर हो,
लेकिन तुम्हारी परछाई मुझे बता देती है
कि दूरियाँ भी कभी प्यार के गीत गा सकती हैं।
मैं, तेरी परछाई और मौसम
तीनों मिलकर एक रूहानी नज़्म बनाते हैं,
जहाँ सिर्फ यादें, एहसास और प्रेम का संगीत होता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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