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Wednesday, 11 March 2026

अध्याय – 02 : धुएँ में चलते हुए गुरु (कन्फूसियस और लाउजी )

लघु उपन्यास – दूसरा खंड

अध्याय – 02 : धुएँ में चलते हुए गुरु 

कमरा खामोश है।

हवा बिल्कुल ठहरी हुई है

जैसे वह हो ही नहीं।


रसोई के प्लेटफॉर्म पर

मेरे थोड़े से बर्तन

धुले-पुँछे

आड़े-तिरछे

लेटे-बैठे हैं।


झाड़ू

अपनी जगह

तख़्त के नीचे सोई हुई है।


सीलिंग फैन भी

कोई हरकत नहीं कर रहा।


दीवारों ने तो

जैसे चुप्पी का

लबादा ही ओढ़ रखा है।


और मैं

बहुत देर से

खामोश बैठा हूँ।


अभी-अभी

माण्डूक्य उपनिषद की प्रति

बगल में रखी है।


मैंने

एक सिगरेट सुलगाई।


हौले से।


धुआँ

हौले-हौले

कमरे में फैलने लगा।


और उसी धुएँ को देखते-देखते

मैं धीरे-धीरे

साक्षी भाव में उतर गया।


साक्षी भाव में ही

कल का दृश्य याद आया


जब

Socrates

अपनी बिखरी दाढ़ी और नंगे पाँव

कमरे में टहल रहे थे,


और

Plato

जोश के साथ

अपनी पुस्तक

The Republic

की बातें कर रहा था।


वह दृश्य

जैसे अभी भी

कमरे में कहीं बचा हुआ था।


मेरी आँखें

धीरे-धीरे

एक गहरी तन्द्रा में उतरने लगीं।


तभी,


मुझे लगा

कमरे में फिर से

एक हल्का-सा धुआँ उठ रहा है।


यह धुआँ

सिगरेट का नहीं था।


यह

किसी और समय का धुआँ था।


उस धुएँ के भीतर

एक आकृति धीरे-धीरे उभरी।


लंबा

पारंपरिक चीनी चोगा।


सिर पर

सरल-सी टोपी।


चेहरा

गरिमामय

और गंभीर।


वह थे

Confucius।


उनकी चाल

एक शिक्षक जैसी थी।


शांत

संतुलित

और संयमित।


वे धीरे-धीरे चलते हुए

मेरे सामने आकर रुके।


फिर अपने चोगे की जेब से

एक पतली पुस्तक निकाली।


वह थी,


Analects


उन्होंने पुस्तक को

धीरे-धीरे खोला।


और बहुत हल्की आवाज़ में

कुछ बुदबुदाने लगे।


उनकी आवाज़

किसी मंत्र जैसी थी।


जैसे कोई शिक्षक

सदियों से

अपने शिष्यों को समझाता आया हो।


वे कह रहे थे,


“मनुष्य का पहला धर्म

सम्मान है।”


“पिता के प्रति सम्मान,

परिवार के प्रति सम्मान,

और समाज के प्रति अनुशासन।”


उनकी आँखों में

एक गहरी नैतिक दृढ़ता थी।


उन्होंने धीरे से कहा—


“यदि मनुष्य

अपने संबंधों को ठीक कर ले

तो समाज स्वयं ठीक हो जाता है।”


कमरे में

एक पल को लगा

जैसे किसी प्राचीन चीनी विद्यालय की

शांति उतर आई हो।


पर उसी धुएँ में

एक और हलचल हुई।


धुएँ की परत

धीरे-धीरे दूसरी दिशा में मुड़ी।


और वहाँ से

एक और आकृति उभरी।


बहुत साधारण वस्त्र।


ढीला

ताओवादी चोगा।


चेहरा

अत्यंत शांत

और रहस्यमय।


वे थे,

Laozi।


उनके हाथ में

एक पतली पुस्तक थी।


उन्होंने उसे धीरे से उठाया।


वह थी ,


Tao Te Ching


लाओज़ी

कुछ नहीं बोले।


उन्होंने बस

आँखें आधी बंद कीं।


और बहुत धीमे स्वर में

कुछ शब्द बुदबुदाए।


उनकी आवाज़

किसी बौद्ध मंत्र जैसी थी।


“प्रकृति

कभी जल्दी नहीं करती

फिर भी

सब कुछ पूरा हो जाता है।”


वे धीरे-धीरे कमरे में चलते रहे।


उनकी चाल में

कोई आग्रह नहीं था।


कोई सिद्धांत नहीं।


सिर्फ़

एक सहज प्रवाह।


उन्होंने धीरे से कहा


“जो पानी जैसा हो जाता है

वही जीवन को समझता है।”


कन्फ्यूशियस

थोड़ा दूर खड़े

उन्हें देख रहे थे।


एक तरफ

अनुशासन और समाज।


दूसरी तरफ

प्रकृति और सहजता।


दोनों के बीच

एक अजीब-सी संतुलित खामोशी थी।


मैं

सिगरेट का धुआँ छोड़ते हुए

बस उन्हें देख रहा था।


कमरे में

अब चार दिशाओं की सभ्यताएँ थीं


यूनान,

चीन,

और सिरहाने पड़ी

उपनिषदों की मौन परंपरा।


कन्फ्यूशियस ने

अपनी पुस्तक बंद की।


लाओज़ी ने

आँखें खोलकर

एक बार कमरे को देखा।


फिर दोनों

धीरे-धीरे

धुएँ की उसी परत में लौटने लगे

जिससे वे आए थे।


कन्फ्यूशियस

अब भी कुछ बुदबुदा रहे थे।


लाओज़ी

मानो किसी अदृश्य नदी के साथ

बह रहे थे।


और कुछ ही क्षणों में

दोनों आकृतियाँ

धुएँ में विलीन हो गईं।


कमरा फिर

वैसा ही हो गया।


बर्तन

अब भी प्लेटफॉर्म पर थे।


झाड़ू

तख़्त के नीचे सो रही थी।


दीवारें

अब भी चुप थीं।


और मैं

सिगरेट का आखिरी कश लेते हुए

सोच रहा था


शायद

दर्शन की सारी यात्राएँ

आख़िरकार

एक ही कमरे में आकर मिलती हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,

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