लघु उपन्यास
भाग – 20 : घर, जीव और बाहर के दर्शन
मैंने सुबह खिड़की खोली।
सिगरेट का धुआँ धीरे-धीरे कमरे में फैल रहा था।
रह-रह कर मेरे विचार बाहर के जीवन में मिल रहे थे।
मुर्गी वाला अपने मुर्गों को छत पर निकाल रहा था।
उनकी कलँगी फर्र-फर्र कर रही थी,
और दाना डालते समय उसकी आँखों में
एक अजीब सा ध्यान और शांति झलक रही थी।
मैंने सोचा,
“ये भी अपने छोटे संसार में दर्शन कर रहे हैं—
कर्म और प्रकृति के नियमों को पढ़ रहे हैं।”
दूधवाला आया।
उसकी बाल्टी में दूध झिलमिला रहा था।
बच्चू और गाय रम्भा अपने काम में व्यस्त थे।
लेकिन दूधवाले की आँखों में
जीवन का गणित और कर्म का अनवरत चक्र साफ दिखाई दे रहा था।
मैंने सिगरेट का कश लिया।
“सांख्य और पश्चिमी दर्शन की तरह,
यह भी नियम, परिश्रम और धैर्य का दर्शन है,” मैंने मन ही मन कहा।
पान वाला गली के नुक्कड़ पर बैठा था।
लोग उसके पास आए और पान खरीदा।
उसकी छोटी दुनिया में भी,
मैंने ध्यान देखा,
“काफ्का के शब्दों की तरह,
जीवन की व्यथा और समाज की सूक्ष्मता यहाँ भी है।
घर के भीतर और बाहर का जीवन,
दोनों दर्शन की एक धारा में बह रहे हैं।”
कमरे में झाड़ू, चम्मच, प्लेट, कूकर और पंखा—
सभी फुसफुसा रहे थे।
“देखो सूत्रधार,
बाहर के लोग भी अपने कर्म और विचारों में व्यस्त हैं।
मुर्गी और दूधवाला, पान वाला और किताबें,
सब अपने-अपने दर्शन में डूबे हैं।”
मैंने सिगरेट का आखिरी कश लिया।
धुआँ हवा में फैलकर बाहर के जीवन में मिश्रित हो गया।
कमरा, बाहर का दृश्य, पालतू जीव और आस-पड़ोस के लोग—
सब मिलकर एक दर्शनशाला बन गए।
पूर्व के सांख्य, पश्चिम के दर्शनकार,
सूफी और ज़ेन,
और घर के निर्जीव और जीवित तत्व—
सबका संगम मेरे मन में अनंत अनुभव बन गया।
फिर छत की ओर झाँकती चिड़िया ने पंख फैलाए।
उसकी निगाहों में मैं देख सकता था—
हर जीव, हर वस्तु, हर क्षण,
जीवन का अपना संगीत लेकर आता है।
मैंने सिगरेट की डिब्बी बंद की।
और चाय की ओर रुख किया,
गुमटी की ओर बढ़ते हुए।
साथ ही सत्र और सायमन दा बौआ की यादें
मुझसे मिलने लगीं।
मुर्गी वाला, दूधवाला और पान वाला
सभी मेरे भीतर दर्शन का अनुभव छोड़ गए।
और मैं बैठा,
घर की हर चीज़ की बात सुनते हुए,
सोच रहा था—
शायद यही जीवन का असली संगीत है।
— मुकेश
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