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Tuesday, 10 March 2026

भाग – 25 : कमरा जो सोचता है

 लघु उपन्यास

भाग – 25 : कमरा जो सोचता है

दरवाज़ा बंद हो चुका था।

मकान मालिक जा चुके थे।
सीढ़ियों से उनके कदमों की आवाज़ धीरे-धीरे ऊपर चली गई
और फिर घर में वही पुराना सन्नाटा उतर आया।

कमरे में लौटकर
मैं कुछ देर दरवाज़े के पास ही खड़ा रहा।

ऐसा लगा
जैसे कमरा भी अभी-अभी हुई बातचीत को
अपने भीतर समेट रहा हो।

मेज़ पर रखा टेबल लैम्प
अब भी उसी धैर्य से जल रहा था।

उसकी रोशनी
किताब, सिगरेट की डिब्बी
और मेरी उँगलियों के बीच पड़ी तस्वीर पर फैल रही थी।

मैं कुर्सी पर बैठ गया।

और अचानक मुझे महसूस हुआ—
यह कमरा सिर्फ़ रहने की जगह नहीं है।

यह शायद
सोचने की जगह है।

यह मनुष्य के मन जैसा है।

बाहर शहर में दंगा है,
लोग एक-दूसरे से लड़ रहे हैं,
आग जल रही है—

और यहाँ
एक छोटा-सा कमरा
शांत बैठा हुआ
मानो मनुष्य के बारे में सोच रहा है।

पंखा धीरे-धीरे घूम रहा था।

उसकी आवाज़ में
एक अजीब-सी स्थिरता थी।

जैसे वह कह रहा हो—
“तुम लोग बदलते रहते हो,
मैं बस हवा देता रहता हूँ।”

मैंने खिड़की की तरफ देखा।

खिड़की आधी खुली थी।

बाहर की गली अँधेरी पड़ी थी
पर दूर कहीं
लाल रोशनी की हल्की झिलमिल दिखाई दे रही थी।

शायद कहीं
कुछ जल रहा था।

मुझे अचानक लगा—
शहर एक बड़ा शरीर है
और यह कमरा
उसका छोटा-सा मस्तिष्क

बाहर हिंसा है,
अंदर विचार।

मेज़ पर रखी किताब
अब भी खुली पड़ी थी—

Sapiens: A Brief History of Humankind

इसके लेखक
Yuval Noah Harari
मनुष्य की पूरी कहानी को
नई दृष्टि से समझाते हैं।

धर्म कैसे बना।
समाज कैसे बना।
पैसा, राष्ट्र और विज्ञान
कैसे हमारी कल्पना से पैदा हुए।

मैंने किताब के पन्ने को छुआ।

और अचानक मुझे लगा—

हज़ारों साल की मानव सभ्यता
कभी-कभी
एक छोटे-से कमरे में बैठकर भी समझी जा सकती है।

क्योंकि कमरा
दरअसल मनुष्य का ही छोटा रूप है।

इसमें भी सब कुछ है—

एक मेज़
जहाँ विचार जन्म लेते हैं।

एक कुर्सी
जहाँ मनुष्य बैठकर दुनिया को समझने की कोशिश करता है।

एक खिड़की
जहाँ से वह बाहर झाँकता है
और समाज को देखता है।

और एक दरवाज़ा
जहाँ से लोग आते हैं
कुछ देर बैठते हैं
और फिर चले जाते हैं।

मुर्गी वाला आया था।
मकान मालिक आए थे।

और कभी
सलोनी भी आती थी।

पर कमरा
यहीं रहता है।

मैंने सिगरेट जलाई।

धुआँ धीरे-धीरे ऊपर उठा
और पंखे की हवा में फैल गया।

मुझे अचानक लगा—

यह धुआँ
मनुष्य के विचार जैसा है।

कुछ देर दिखाई देता है
फिर हवा में घुल जाता है।

बाहर शायद
फिर से पुलिस की जीप गुज़री।

कुछ सेकंड के लिए
सायरन की आवाज़ आई
और फिर सब शांत।

कमरा फिर सोचने लगा।

मैंने कुर्सी से पीठ टिकाई
और आँखें बंद कर लीं।

मुझे लगा—

अगर कोई दूर से देखे
तो उसे यह दृश्य बहुत अजीब लगेगा।

एक शहर जल रहा है।
और एक आदमी
अपने कमरे में बैठकर
मनुष्य के इतिहास की किताब पढ़ रहा है।

पर शायद
सभ्यता हमेशा ऐसे ही बचती है—

जब बाहर शोर हो
तो कहीं न कहीं
कोई छोटासा कमरा
अब भी सोच रहा होता है।

पंखा घूमता रहा।

टेबल लैम्प जलता रहा।

और मुझे लगा—

यह कमरा
सिर्फ़ मेरा नहीं है।

यह मनुष्य के भीतर मौजूद
उस छोटे-से स्थान का प्रतीक है
जहाँ वह
अब भी सोच सकता है।

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