लघु उपन्यास : अस्तित्व और साक्षी - भाग – 3 - अध्याय 9 : यात्रा की शुरुआत
यात्राएँ अक्सर अचानक तय नहीं होतीं।
वे पहले मन में शुरू होती हैं—धीरे-धीरे, जैसे किसी विचार का अंकुर।
फिर एक दिन वही विचार निर्णय बन जाता है।
अस्तित्व के साथ भी यही हुआ।
नर्मदा के उस छोटे-से घाट की तस्वीर देखने के बाद से ही उसके भीतर एक अजीब-सी बेचैनी थी।
यह बेचैनी किसी रोमांच की नहीं थी, बल्कि उस प्रश्न की थी जो वर्षों से उसके भीतर आकार ले रहा था।
तीन दिन बाद की सुबह।
रेलवे स्टेशन का प्लेटफ़ॉर्म लोगों से भरा हुआ था।
सामान के बैग, चाय बेचने वालों की आवाज़ें, दूर खड़ी ट्रेन की लंबी साँस—सब मिलकर एक परिचित यात्रा का वातावरण बना रहे थे।
अस्तित्व प्लेटफ़ॉर्म के एक खंभे के पास खड़ा था।
उसके हाथ में केवल एक छोटा बैग था।
वह हमेशा यात्राओं में ज़्यादा सामान नहीं लेता था—उसे लगता था कि जितना कम साथ हो, उतना मन हल्का रहता है।
कुछ ही देर में साक्षी वहाँ पहुँची।
सफेद और हल्के नीले रंग की सादी-सी साड़ी, कंधे पर एक छोटा बैग, और चेहरे पर वही शांत भाव—जैसे वह किसी बाहरी यात्रा से अधिक किसी आंतरिक यात्रा पर निकली हो।
दोनों ने एक-दूसरे को देखकर हल्की मुस्कान से अभिवादन किया।
“तुम समय से पहले आ गई,” अस्तित्व ने कहा।
साक्षी ने धीमे स्वर में उत्तर दिया
“कुछ यात्राएँ देर से शुरू नहीं करनी चाहिए।”
अस्तित्व कुछ क्षण उसे देखता रहा।
उसके इस वाक्य में भी वही गहराई थी जो अक्सर उसके प्रश्नों में होती थी।
तभी पीछे से परिचित आवाज़ आई
“अगर आप दोनों ने दर्शन पूरा कर लिया हो तो ट्रेन पकड़ लें।”
यह नील था।
हाथ में कॉफ़ी के तीन कप लिए वह तेजी से उनकी ओर आ रहा था।
“मैंने सोचा,” वह हँसते हुए बोला, “इतनी गंभीर यात्रा बिना कॉफ़ी के शुरू करना उचित नहीं होगा।”
तीनों हँस पड़े।
पर उस हँसी के पीछे भी एक हल्की-सी उत्सुकता थी।
ट्रेन धीरे-धीरे प्लेटफ़ॉर्म पर आकर रुकी।
कुछ ही मिनटों में वे अपने डिब्बे में बैठ चुके थे।
खिड़की के बाहर शहर धीरे-धीरे पीछे छूटने लगा।
पहले भीड़भाड़ वाले मकान,
फिर छोटे-छोटे घर,
और थोड़ी देर बाद खुले खेत।
कुछ समय तक तीनों चुप बैठे रहे।
यात्रा की शुरुआत में अक्सर ऐसा होता है
मन अभी भी पीछे छूटते शहर के साथ थोड़ा जुड़ा रहता है।
फिर धीरे-धीरे वह नए रास्ते की लय में ढलने लगता है।
नील ने आखिर चुप्पी तोड़ी।
“मुझे अब भी यह समझ में नहीं आया कि हम तीन लोग एक सपने की वजह से इतनी लंबी यात्रा पर क्यों निकल पड़े हैं।”
साक्षी ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा
“कभी-कभी कारण सपने नहीं होते…
कारण वह प्रश्न होता है जो सपना छोड़ जाता है।”
नील ने हल्के आश्चर्य से कहा—
“आप दोनों की बातों से मुझे सच में लगने लगा है कि मैं किसी उपन्यास के भीतर चल रहा हूँ।”
अस्तित्व मुस्कराया।
“संभव है कि हम सब हमेशा से किसी न किसी कहानी के भीतर ही चलते रहते हैं।”
ट्रेन की गति अब तेज़ हो चुकी थी।
खिड़की के बाहर खेतों के बीच बहती छोटी-छोटी नदियाँ दिखाई देने लगी थीं।
अस्तित्व ने कुछ देर बाद कहा
“तुम दोनों से एक बात पूछनी है।”
नील ने तुरंत कहा
“फिर से कोई दार्शनिक प्रश्न?”
अस्तित्व ने हल्के से सिर हिलाया।
“अगर सचमुच वह जगह हमारे सपने जैसी निकली तो?”
साक्षी ने शांत स्वर में कहा
“तो शायद हमें यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि वह सपना क्यों आया।”
नील ने बीच में कहा
“और अगर वह बिल्कुल अलग निकली?”
अस्तित्व ने खिड़की से बाहर देखते हुए उत्तर दिया
“तब भी यात्रा व्यर्थ नहीं होगी।
क्योंकि कभी-कभी हम जिस जगह तक पहुँचने के लिए निकलते हैं,
वह जगह उतनी महत्वपूर्ण नहीं होती
जितनी वह यात्रा
जो हमें अपने भीतर कराती है।”
साक्षी ने पहली बार उसकी ओर ध्यान से देखा।
“तुम्हें पता है,” उसने धीरे से कहा,
“पहली बार जब मैंने तुमसे बात की थी, तब भी तुमने कुछ ऐसा ही कहा था।”
अस्तित्व हल्का-सा मुस्कराया।
“शायद इसलिए कि कुछ बातें बदलती नहीं हैं।”
ट्रेन अब एक लंबे पुल से गुजर रही थी।
नीचे एक चौड़ी नदी बह रही थी।
तीनों कुछ क्षण खिड़की से बाहर देखने लगे।
बहता हुआ पानी हमेशा एक अजीब-सी अनुभूति देता है
जैसे समय स्वयं सामने से गुजर रहा हो।
अस्तित्व के मन में अचानक एक विचार आया
क्या नर्मदा की वह नदी सचमुच उनके सपने जैसी होगी?
क्या वहाँ पहुँचकर उन्हें लगेगा कि वे पहले भी वहाँ आ चुके हैं?
या फिर वहाँ जाकर यह समझ में आएगा कि सपना केवल मन की एक गहरी संरचना था?
ट्रेन पुल पार कर चुकी थी।
पर उस क्षण अस्तित्व को यह स्पष्ट महसूस हुआ
यह यात्रा केवल एक भौगोलिक स्थान तक पहुँचने की नहीं है।
यह यात्रा शायद उस बिंदु तक पहुँचने की है
जहाँ स्मृति, सपना और वास्तविकता
एक ही धारा में मिल जाते हैं।
मुकेश ,,,,,
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