भीगी चूनर, महकता इज़हार
रंगों की बारिश थमी तो
आँगन में बस भीगी हुई चूनर रह गई
टेसू की लाली, अबीर की धुंध,
और तुम्हारी हँसी की चमक
उसके ताने-बाने में उलझी हुई।
तुमने जब उसे झटका हल्के से,
हवा में महक फैल गई
जैसे कोई राज़
लफ़्ज़ बनने से पहले ही
दिल से बाहर आ गया हो।
भीगी चूनर के किनारों पर
रंग गहरा था सबसे ज़्यादा,
वहीं शायद मैंने
अपना नाम अनजाने में लिख दिया था।
तुमने कुछ कहा नहीं,
बस नज़रें झुका लीं
और उस झिझक में
पूरा इज़हार खिल उठा।
शाम ढलती रही,
रंग सूखते रहे बदन पर,
पर उस भीगी चूनर की महक
अब भी हवा में तैरती है
जैसे मोहब्बत
कभी पूरी तरह सूखती नहीं,
बस यादों में
धीरे-धीरे बस जाती है।
मुकेश ,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment