तन्हाई का दरवेश
एक दरवेश है—
जो मेरे दिल की
सबसे सुनसान गली में रहता है।
न उसके पास
कोई नाम है
न कोई पहचान,
बस एक पुरानी चादर है
और आँखों में
रौशनी की गहराई।
जब दुनिया
अपने शोर में डूब जाती है,
और शहर की गलियाँ
थककर सो जाती हैं—
तब वो दरवेश
मेरे अंदर
धीरे-धीरे जागता है।
वो कुछ कहता नहीं,
बस
मेरे कंधे पर हाथ रखकर
मुस्करा देता है।
उसकी मुस्कान में
अजीब-सा सुकून होता है—
जैसे किसी ने
रूह की थकी हुई राह पर
एक दीपक जला दिया हो।
कभी-कभी
मैं उससे पूछता हूँ—
“तू कौन है?”
वो बस इतना कहता है—
“मैं वही हूँ
जिसे तू दुनिया की भीड़ में
भूल गया है।”
तन्हाई का दरवेश
मुझे हर रात
एक ही रास्ता दिखाता है—
अपने ही अंदर लौटने का।
और जब मैं
उस रास्ते पर चलता हूँ
तो लगता है
कि रूह की यह तन्हाई
दरअसल
ख़ुदा की सबसे गहरी सोहबत है।
मुकेश्,,,
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