वह बरगद हो गया
एक पुराने शहर में, इलाहाबाद में, एक पुरुष था
बहस करता हुआ
अख़बार के हर कॉलम पर राय रखता
राजनीति, बारिश, महँगाई, क्रिकेट—
हर विषय पर
उसके पास शब्द होते
हँसता हुआ
महफ़िल में चुटकुले छोड़ता
दूसरों के दुःख पर
सबसे पहले
सहानुभूति रखता
और इन्हीं सबके बीच
वह पुरुष
हर बात पर बोलता था
सिवाय
अपने बारे में
वह रोज़ दफ़्तर जाता
फ़ाइलों के बीच
सबकी उलझनें सुलझाता
पर अपनी पंक्ति
हमेशा
ख़ाली छोड़ देता
उसके बोलते रहने से नहीं
उसके चुप रहने से
जन्म लेती थी एक कथा—
उस प्रेम की
जिसे उसने
समझा बहुत
कहा कभी नहीं
लोग कहते थे—
“तुम तो बड़े सुलझे हुए हो”
किसी ने नहीं पूछा
कि सुलझते-सुलझते
वह खुद
कहाँ बिखर गया
एक दिन
वह पुरुष
बरगद हो गया
बरगद होना
ऐसे पुरुषों के हिस्से आता है
जो सबको
छाया देते हैं
और खुद
धूप में खड़े रहते हैं
जिसकी जड़ों में
अनकहे वाक्य दबे रहते हैं
और शाखाओं पर
दूसरों की अपेक्षाएँ
एक दिन
उस बरगद पर
बच्चे चढ़े
पंछी शोर मचाने लगे
राहगीर
साँस भर को रुके
और बरगद
सब कुछ सुनता रहा
हर बात पर बोला
बस
अपने सूखेपन पर
नहीं
फिर अचानक
हँसा वह पुरुष
जिसकी हँसी
कभी कारण नहीं माँगती
टूटा भ्रम—
कि जो बोलता है
वह सब कह देता है
गली दर गली
मन दर मन
एक पुराने शहर में, इलाहाबाद में
एक ऐसा पुरुष भी था
जो हर विषय पर बोलता था
सिवाय
अपने होने के।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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