प्रेम और अनंत का विज्ञान
ब्रह्मांड की सबसे गहरी प्रयोगशाला
न कोई दूरबीन है,
न कोई कण-त्वरक,
वह तो मनुष्य का हृदय है—
जहाँ
प्रेम और अनंत
अपना मौन प्रयोग करते हैं।
तारे जन्म लेते हैं,
आकाशगंगाएँ घूमती हैं,
समय अपनी लंबी नदी बहाता है,
मगर इन सबके बीच
एक सवाल हमेशा जीवित रहता है
क्या प्रेम
सिर्फ़ मनुष्य की भावना है,
या
यह भी ब्रह्मांड का
कोई गुप्त नियम है?
जैसे गुरुत्वाकर्षण
कणों को जोड़ता है,
वैसे ही
प्रेम
आत्माओं को पास लाता है।
यह कोई सूत्र नहीं,
पर एक अदृश्य आकर्षण है
जो दो अस्तित्वों के बीच
एक सेतु बना देता है।
विज्ञान कहता है—
ब्रह्मांड का हर कण
किसी न किसी शक्ति से बँधा है।
और शायद
प्रेम भी
उसी बंधन का
सबसे सूक्ष्म और मानवीय रूप है।
अनंत
वह विस्तार है
जहाँ गणना समाप्त हो जाती है,
जहाँ दूरी का अर्थ मिट जाता है,
और समय भी
धीरे-धीरे मौन हो जाता है।
प्रेम भी
कुछ वैसा ही है
जितना उसे बाँधने की कोशिश करो,
वह उतना ही
सीमाओं से बाहर निकल जाता है।
एक स्पर्श
कभी-कभी
सदियों तक स्मृति बनकर जीता है,
एक नाम
समय के पार जाकर भी
हृदय में गूँजता रहता है।
शायद इसलिए
कवि उसे अनंत कहते हैं
और संत उसे
आत्मा का विस्तार।
प्रेम
मनुष्य को सीमित से
असीम की ओर ले जाता है।
वह सिखाता है
कि किसी दूसरे के भीतर
अपने ही अस्तित्व की झलक देखी जा सकती है।
और जब ऐसा होता है,
तो दो व्यक्तियों के बीच
केवल संबंध नहीं बनता—
वहाँ
एक छोटा-सा ब्रह्मांड जन्म लेता है।
यही प्रेम और अनंत का विज्ञान है
जहाँ भावना
सिर्फ़ भावना नहीं रहती,
वह एक ब्रह्मांडीय नियम की तरह
मनुष्य के भीतर काम करने लगती है।
और तब
समय की लंबी यात्रा में
एक साधारण मनुष्य भी
अनंत का स्पर्श महसूस करने लगता है।
शायद
ब्रह्मांड का सबसे सुंदर रहस्य
यही है
कि
अनंत आकाश में जितने तारे हैं,
मनुष्य के हृदय में
उतने ही
प्रेम के संभावित प्रकाश भी छिपे हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,
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