निहारिकाएँ : एक शोधपूर्ण नज़्म
निहारिकाएँ
सिर्फ़ आकाश की सजावट नहीं,
वे ब्रह्मांड की प्रयोगशालाएँ हैं
जहाँ धूल
अपने कणों की जीवनी लिखती है।
हाइड्रोजन की विरल साँसें,
हीलियम की मौन संगति,
और कार्बन का बीज—
यहीं पहली बार
एक-दूसरे को पहचानते हैं।
वैज्ञानिक उन्हें
उत्सर्जन, परावर्तन और अंधकार
तीन वर्गों में बाँटते हैं
पर सच तो यह है
कि हर निहारिका
प्रकाश और छाया की
संयुक्त शोध-पत्र है।
उत्सर्जन निहारिका
जहाँ आयनित गैस
लालिमा में चमकती है,
जैसे तापमान ने
अपनी ही देह प्रकाशित कर दी हो।
परावर्तन निहारिका
जो स्वयं नहीं जलती,
पर पास के तारे की रोशनी
उधार लेकर
नीले स्वप्न रचती है।
अंधकार निहारिका
जो कुछ भी नहीं दिखाती,
पर अपने घने मौन में
हजारों संभावनाएँ छिपाए रहती है।
खगोल-दर्शी जब
दीर्घ-अनावरण चित्र लेते हैं,
तो पाते हैं
धूल के ये बादल
स्थिर नहीं,
गति में हैं।
गुरुत्वाकर्षण
धीरे-धीरे
कणों को समीप लाता है,
घनत्व बढ़ता है,
ताप बढ़ता है
और किसी अनाम क्षण
एक तारा जन्म लेता है।
इस प्रकार
निहारिकाएँ
अतीत का अवशेष भी हैं
और भविष्य की भूमिका भी।
कहा जाता है
हमारे शरीर का लोहा
कभी किसी तारे के भीतर बना था;
तो संभव है
हमारी धमनियों में बहता रक्त
किसी प्राचीन निहारिका का
विस्तारित स्वप्न हो।
इसलिए
जब हम रात में
आकाश की ओर देखते हैं,
तो केवल दूरियाँ नहीं निहारते
हम अपनी उत्पत्ति के
मूल दस्तावेज़ पढ़ रहे होते हैं।
निहारिकाएँ
दरअसल ब्रह्मांड का वह अध्याय हैं
जहाँ पदार्थ
प्रार्थना बन जाता है,
और धूल
दीर्घकालिक अर्थ।
वे हमें सिखाती हैं
विरलता से भी
सृष्टि हो सकती है,
और अंधकार के भीतर भी
एक तारे की संभावना
सदैव लिखी रहती है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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