होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Sunday, 22 March 2026

कर्म आपको बाँधता है, पर चेतना आपको मुक्त करती है…

 कर्म आपको बाँधता है,

पर चेतना आपको मुक्त करती है…


हाथ काम में लगे रहते हैं

रिश्तों, चाहतों, परिणामों के धागों में,

हर कर्म एक गिरह बनाता है,

जो वक़्त के साथ कसती जाती है।


पर भीतर—

एक शांत साक्षी है,

जो न करता है, न बंधता है,

बस देखता है…


जब तुम उसी में ठहर जाते हो,

तो कर्म चलता रहता है

पर तुम उससे बाहर हो जाते हो।


तभी समझ आता है

बंधन कर्म का नहीं,

पहचान का था…


और मुक्ति?

वो कहीं दूर नहीं—

बस एक जागरण है,

जहाँ “मैं करता हूँ”

धीरे से मिट जाता है…


और शेष बचता है

सिर्फ़ होना।


मुकेश ,,,,

No comments:

Post a Comment