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Saturday, 7 March 2026

मनुष्य और अनंत की दूरी

 मनुष्य और अनंत की दूरी

मनुष्य

धरती की धूल से बना हुआ

एक छोटा-सा जीव है,

पर उसकी आँखों में

आकाश की गहराई बसती है।


वह चलता है

मिट्टी के रास्तों पर,

पर उसके प्रश्न

तारों तक पहुँच जाते हैं।


यही

मनुष्य और अनंत के बीच

सबसे अद्भुत रिश्ता है।


अनंत

कोई स्थान नहीं,

कोई माप नहीं,

वह तो

एक ऐसा विस्तार है

जहाँ गणना की हर रेखा

धीरे-धीरे मिट जाती है।


और मनुष्य

वह सीमाओं का प्राणी है।


उसकी आयु सीमित,

उसकी शक्ति सीमित,

उसकी समझ भी

धीरे-धीरे बढ़ने वाली।


फिर भी

वह अनंत की कल्पना करता है।


वह

आकाश की दूरियों को नापता है,

संख्याओं को अनंत तक बढ़ाता है,

और ध्यान में

सीमाओं से परे जाने का स्वप्न देखता है।


कभी लगता है

मनुष्य और अनंत के बीच

एक असंभव दूरी है


जैसे

एक बूँद और समुद्र के बीच।


पर फिर

एक और सत्य सामने आता है।


वही बूँद

समुद्र का ही जल होती है।


मनुष्य

अनंत को पूरी तरह पा नहीं सकता,

पर उसकी झलक

अपने भीतर महसूस कर सकता है।


कभी

किसी गहरी अनुभूति में,

कभी

किसी महान विचार में,

और कभी

उस क्षण में

जब वह अपनी सीमाओं को भूल जाता है।


तभी

मनुष्य समझता है


अनंत

कोई दूर का आकाश नहीं,

बल्कि

अस्तित्व की वही गहराई है

जिसकी एक छोटी-सी लहर

उसके भीतर भी उठती है।


शायद

मनुष्य और अनंत की दूरी

वास्तव में दूरी नहीं,

एक खोज है।


एक यात्रा

जिसमें सीमित चेतना

धीरे-धीरे

असीम की ओर बढ़ती है।


और इस यात्रा में

हर प्रश्न

एक नया कदम बन जाता है।


तब

समय की लंबी धारा में

मनुष्य

अपने छोटे-से जीवन के बावजूद

अनंत को छूने का साहस करता है।


शायद

यही उसका सबसे बड़ा चमत्कार है—


कि

सीमित होते हुए भी

वह अनंत के बारे में सोच सकता है।

और शायद

यही सोच

मनुष्य और अनंत के बीच

सबसे छोटी दूरी है।

मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,

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