अहंकार और करुणा का द्वंद्व
मनुष्य के भीतर
दो शक्तियाँ साथ रहती हैं
अहंकार
और करुणा।
एक कहती है
“मैं हूँ,
और सब मुझसे अलग हैं।”
दूसरी धीरे से पूछती है
“अगर सब अलग हैं,
तो तुम्हारा अस्तित्व
किससे जुड़ा है?”
अहंकार
सीमाएँ बनाता है,
नाम, पद और पहचान की दीवारें।
वह
स्वयं को ऊँचा देखने के लिए
दूसरों को
नीचा करने की
छोटी-छोटी सीढ़ियाँ बनाता है।
और करुणा—
वह दीवारें नहीं बनाती,
वह दरवाज़े खोलती है।
वह कहती है—
दर्द किसी का भी हो,
उसकी प्रतिध्वनि
आख़िर मनुष्य के भीतर ही
सुनाई देती है।
अहंकार
सत्ता चाहता है,
स्वीकृति चाहता है,
और हर बार
अपने होने का प्रमाण
दुनिया से माँगता है।
करुणा
प्रमाण नहीं माँगती,
वह केवल
साझा अस्तित्व को पहचानती है।
जब मनुष्य
अहंकार में जीता है
तो संसार
प्रतिस्पर्धा बन जाता है।
और जब
करुणा में उतरता है
तो वही संसार
संबंध बन जाता है।
यही
अहंकार और करुणा का द्वंद्व है—
एक
अलगाव की भाषा बोलता है,
दूसरा
एकत्व का मौन रचता है।
और अंततः
जीत उसी की होती है
जो मनुष्य को
मनुष्य से जोड़ दे।
क्योंकि
अहंकार से
सभ्यताएँ बन सकती हैं,
पर करुणा से ही
मानवता बची रहती है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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