एक ख़ूबसूरत रेडियो अनाउंसर
वो
कभी दिखाई नहीं देती,
फिर भी
कितने लोगों की शामों में
उसकी मौजूदगी होती है।
रेडियो के उस छोटे-से कमरे में
बैठी
वो अपनी आवाज़ को
धीरे-धीरे
हवा में छोड़ देती है—
जैसे कोई
रात के आँगन में
एक दीप जला रहा हो।
उसका चेहरा
किसी को मालूम नहीं,
पर उसकी आवाज़
हज़ारों चेहरों तक
पहुँचती रहती है।
जब वो बोलती है
तो लगता है
जैसे शब्द
सिर्फ़ कहे नहीं जा रहे,
बल्कि
किसी नरम धुन की तरह
दिलों में उतर रहे हैं।
कभी वो
एक पुराने गीत का नाम लेती है,
और अचानक
किसी के कमरे में
बीता हुआ समय
फिर से लौट आता है।
कभी उसकी हँसी
रेडियो तरंगों पर
हल्की-सी चमक बन जाती है
जैसे दूर कहीं
रात के आसमान में
एक तारा मुस्कुरा रहा हो।
वो
एक ख़ूबसूरत रेडियो अनाउंसर है
जिसकी असली ख़ूबसूरती
उसकी आवाज़ में छिपी है।
एक ऐसी आवाज़
जो दिखाई नहीं देती,
पर
कितनी ही तन्हा रातों को
थोड़ा कम तन्हा
कर देती है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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