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Wednesday, 11 March 2026

किताब : रूह की ख़ामोश आवाज़

 किताब : रूह की ख़ामोश आवाज़

कहते हैं

हर इंसान के भीतर

एक अनलिखी किताब होती है।


जिसे

वक़्त लिखता है

तजुर्बा सजाता है

और

रूह पढ़ती रहती है।


मगर

बाहर की किताबें

उस अंदर की किताब का

आईना होती हैं।


जब तुम

एक किताब खोलते हो


दरअसल

तुम एक दरवाज़ा खोलते हो


किसी सूफ़ी की तन्हाई का

किसी फ़कीर की सादगी का

किसी दार्शनिक की बेचैनी का।


हर किताब

किसी दिल की

लंबी इबादत है।


किताबें

शोर नहीं करतीं।


वे

दरगाह के चिराग़ की तरह

धीरे-धीरे जलती हैं।


जो भी

उनके पास बैठता है

उसकी रूह में

हल्की सी रोशनी उतर आती है।


एक अजीब राज़ है


जब इंसान

किताबें पढ़ता है

तो वह

दूसरों की ज़िन्दगी नहीं पढ़ता


वह

अपने ही भीतर के

छुपे हुए सवाल पढ़ने लगता है।


किताबें

इल्म से ज़्यादा

जागरण देती हैं।


वे

बताती नहीं

जगाती हैं।


और जब

मनुष्य सचमुच जाग जाता है

तो उसे पता चलता है—


सबसे बड़ी किताब

काग़ज़ पर नहीं

उसके अपने दिल में लिखी है।


और शायद

इसीलिए


जब कोई इंसान

सचमुच पढ़ने लगता है


तो धीरे-धीरे

वह किताबों से आगे निकलकर

खुद

एक किताब बन जाता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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