प्रेम की वो भोली सी तस्वीर
प्रेम की वो भोली सी तस्वीर
अब भी कहीं टंगी है
मेरे दिल की दीवार पर,
थोड़ी फीकी,
पर उतनी ही सच्ची।
उसमें तुम हो
हँसती हुई,
बिना किसी बनावट के,
जैसे सुबह की पहली रोशनी
धीरे से आँखों को छू जाए।
तुम्हारी आँखों में
कोई चालाकी नहीं थी,
बस एक सीधी-सी ज़िद थी
मुझे वैसे ही चाहने की
जैसा मैं था।
हम दोनों उस तस्वीर में
कुछ भी बनने की कोशिश में नहीं थे,
बस साथ होने की सादगी में
पूरा संसार जी रहे थे।
वक़्त ने उस तस्वीर पर
धूल ज़रूर बिठा दी है,
पर अजीब बात है
उसकी मासूमियत अब भी
मेरे भीतर चमकती है।
प्रेम की वो भोली सी तस्वीर
कभी-कभी यूँ ही
आँखों के सामने आ जाती है,
और मैं मुस्कुरा देता हूँ…
जैसे कोई पुराना सपना
फिर से सच हो गया हो।
— मुकेश इलाहाबादी
No comments:
Post a Comment