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Saturday, 7 March 2026

जिस दिन आईने ने सच बोल दिया

 

जिस दिन आईने ने सच बोल दिया,

चेहरे पर चिपके हुए

सारे मौसम उतर गए।


हँसी के पीछे छुपी थकान

आँखों के नीचे ठहरा हुआ समय

और होंठों की कोरों पर

अनकहे सवाल दिखाई देने लगे।


उस दिन पता चला

कि हम आईना कम

और मुखौटे ज़्यादा देखते रहे थे।


आईना तो हमेशा से

एक मौन ऋषि की तरह

दीवार पर टंगा था,

जो हर सुबह

बिना निर्णय के

हमारा साक्षी बनता था।


पर हम ही

उसकी आँखों में झाँकने से डरते रहे,

क्योंकि वहाँ

चेहरा नहीं,

चरित्र दिखाई देता है।


जिस दिन आईने ने सच बोल दिया,

उस दिन पहली बार

मनुष्य ने अपने भीतर

एक और मनुष्य को देखा

जो भीड़ में नहीं रहता,

जो तालियों से नहीं जीता,

जो चुपचाप

आत्मा की चौखट पर बैठा

हमारे लौटने की प्रतीक्षा करता है।


और तब समझ में आया

सच आईने में नहीं रहता,

सच तो

उस क्षण जन्म लेता है

जब हम

खुद से नज़रें मिलाने की

हिम्मत कर लेते हैं।


मुकेश ,,,,,,,

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