स्मृति, इतिहास और मनुष्य
समय की तहों में
कुछ आवाज़ें दब जाती हैं,
कुछ क़िस्से धूल बनकर
पुरानी किताबों पर जम जाते हैं।
मगर
हर धूल के क़तरे में
एक कहानी साँस लेती है
उसे ही
हम स्मृति कहते हैं।
स्मृति
वो ख़ामोश आईना है
जिसमें मनुष्य
अपना बीता हुआ चेहरा देखता है।
कभी
वो किसी सभ्यता की टूटी हुई दीवार पर
लिखी हुई इबारत बन जाती है,
कभी
किसी बूढ़े दरख़्त की छाल में
समय का नक़्शा।
इतिहास
दरअसल
स्मृतियों का वही कारवाँ है
जो सदियों की सड़कों से गुज़रता हुआ
आज तक पहुँचता है।
कभी
वो युद्धों की राख में मिलता है,
कभी
किसी शायर की स्याही में।
मनुष्य
अजीब मख़लूक़ है
वो सिर्फ़ जीता नहीं,
वो याद भी रखता है।
और यही याद
उसे बाकी प्राणियों से
थोड़ा अलग बना देती है।
जब कोई शहर उजड़ता है
तो उसकी ईंटें
सिर्फ़ मलबा नहीं होतीं
उनमें
किसी का हँसना,
किसी का रोना,
किसी का सपना
अब भी दबा होता है।
इतिहासकार
उन्हीं ईंटों को उठाकर
समय की किताब पढ़ता है,
और कहता है—
“देखो,
यहाँ कभी
एक जीवन धड़कता था।”
पर सच तो यह है
इतिहास
सिर्फ़ राजाओं और युद्धों की कथा नहीं,
वो मनुष्य की स्मृति का
सबसे लंबा वाक्य है।
उसमें
किसी माँ की लोरी भी है,
किसी प्रेमी की प्रतीक्षा भी,
और
किसी यात्री के पाँवों की धूल भी।
मनुष्य
जब भविष्य की ओर चलता है
तो उसके कंधों पर
सदियों की स्मृतियाँ होती हैं।
और शायद
इसीलिए
हर नई सुबह में भी
कल की हल्की-सी परछाई रहती है।
समय की नदी बहती रहती है,
सभ्यताएँ आती-जाती रहती हैं,
मगर
स्मृति का एक दीप
हर युग में जलता रहता है
ताकि मनुष्य
अपने अतीत की रोशनी में
भविष्य का रास्ता पहचान सके।
क्योंकि
अगर स्मृति न हो
तो इतिहास अंधा हो जाएगा,
और
अगर इतिहास न हो
तो मनुष्य
अपने ही समय में
एक अनजान मुसाफ़िर बन जाएगा।
तब शायद
ब्रह्मांड की ख़ामोशी में
एक सवाल गूँजेगा
क्या मनुष्य
सिर्फ़ जीने के लिए आया था,
या
याद रखने के लिए भी?
और
शायद
इसी सवाल में
स्मृति, इतिहास और मनुष्य का
सबसे गहरा रिश्ता छुपा है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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