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Sunday, 1 March 2026

इतिहास से परे

 “इतिहास से परे”


सुनो जाना,

इतिहास की जिल्दों में

स्याही अक्सर एक-सी रही है

पुरुष को खलनायक लिखा गया,

स्त्री को शिकार।


कहा गया

पुरुष की उँगलियाँ

बस देह की सतह तक जाती हैं,

उसकी चाहत

त्वचा की चमड़ी से गहरी नहीं उतरती।


पर इतिहास

हमेशा अदालत नहीं होता,

कभी-कभी वह अधूरा बयान भी होता है।


बहुत बार ऐसा नहीं हुआ है।


बहुत बार

पुरुष ने प्रेम किया है

पूरी त्वरा से

जैसे नदी बाँध तोड़कर उतरती है,

जैसे कोई शब्द

सीधे हृदय की धमनियों में उतर जाए।


उसने घर नहीं,

अपना समय समर्पित किया;

सिर्फ़ स्पर्श नहीं,

अपनी असुरक्षाएँ भी खोलीं।


उसने सीखा

रोना छिपाना,

कंधे मजबूत दिखाना,

पर भीतर की काँपती ज़मीन

किसी को न दिखाना।


और हाँ,

अक्सर ऐसा भी हुआ है

स्त्री ने प्रेम में

पहले भविष्य देखा,

फिर पुरुष।


उसने धन की स्थिरता तौली,

सुरक्षा की छाया नापी,

मजबूती की दीवारें परखी।


उसने पूछा

“तुम मुझे कहाँ ले जाओगे?”

जबकि पुरुष पूछना चाहता था

“तुम मेरे साथ कितनी दूर चलोगी?”


कमज़ोर समयों में

जब जेब हल्की थी,

कंधे झुके थे,

और आत्मविश्वास की आवाज़ काँप रही थी—

कभी-कभी

वही स्त्री चली भी गई

जिसे उसने अपना अंतिम सत्य माना था।


यह आरोप नहीं,

बस एक दृश्य है

जिसे हमने कम लिखा,

कम पढ़ा,

कम स्वीकारा।


प्रेम में

दोनों ही पक्ष

अपनी-अपनी भूख लेकर आते हैं

कोई स्थायित्व की,

कोई समर्पण की;

कोई सुरक्षा की,

कोई स्वीकृति की।


पुरुष देह का पुजारी रहा होगा कहीं-कहीं,

पर वह मन का याचक भी रहा है

यह कम क्यों लिखा गया?


स्त्री ने धन देखा होगा कई बार,

पर उसने प्रेम में टूटना भी सीखा है

यह भी उतना ही सत्य है।


प्रेम

न तो स्त्री की चतुराई भर है,

न पुरुष की छल-कथा।


वह एक जोखिम है—

जहाँ दोनों

अपनी-अपनी कमजोरियों के साथ उतरते हैं।


और जो टिक पाता है,

वह देह से नहीं,

धन से नहीं,

बल्कि उस क्षण से टिकता है

जब कोई एक

दूसरे के असफल समय में भी

हाथ नहीं छोड़ता।


सुनो जाना,

इतिहास बदला जा सकता है—

यदि हम प्रेम को

आरोप की भाषा में नहीं,

स्वीकार की भाषा में लिखें।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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