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Saturday, 7 March 2026

मृत्यु और अमरता की कथा

 मृत्यु और अमरता की कथा

समय की लंबी नदी में

एक सत्य

हर जीवन के साथ चलता है

मृत्यु।


वह

किसी छाया की तरह नहीं,

बल्कि

एक निश्चित क्षण की तरह आती है

जिसे टाला नहीं जा सकता।


जब कोई फूल मुरझाता है,

जब कोई तारा बुझता है,

या जब

किसी मनुष्य की साँस

धीरे-धीरे थम जाती है


तब

मृत्यु

अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है।


पहली नज़र में

वह अंत लगती है,

जैसे किसी कहानी का

अंतिम वाक्य।


पर मनुष्य की चेतना

इतनी जल्दी

इस निष्कर्ष को स्वीकार नहीं करती।


क्योंकि

हर अंत के भीतर

एक प्रश्न छिपा होता है—


क्या सचमुच

सब कुछ यहीं समाप्त हो जाता है?


यहीं से

अमरता का विचार जन्म लेता है।


अमरता

सिर्फ़ शरीर का न होना नहीं,

वह

अस्तित्व के उस आयाम की खोज है

जो समय से परे हो।


प्राचीन ऋषियों ने कहा

शरीर मिट्टी से बना है

और मिट्टी में लौट जाता है,


पर चेतना

उससे कहीं अधिक गहरी है।


वह

जीवन के अनुभवों से गुजरती है

और

समय की सीमाओं से परे

अपनी यात्रा जारी रखती है।


वैज्ञानिक दृष्टि से भी

अस्तित्व का एक नियम है


ऊर्जा

नष्ट नहीं होती,

वह केवल

रूप बदलती है।


शायद

जीवन भी

उसी रहस्य का हिस्सा है।


मृत्यु

एक रूप का अंत है,

पर संभावना का नहीं।


इसीलिए

मनुष्य ने

अमरता को कई रूपों में खोजा


कभी

संतानों में,

कभी

विचारों में,

और कभी

कला और ज्ञान में।


किसी कवि की पंक्ति

सदियों बाद भी जीवित रहती है,

किसी विचारक का सत्य

समय को पार कर जाता है।


इस तरह

मनुष्य

अपने सीमित जीवन के बावजूद

अमरता को छूने की कोशिश करता है।


शायद

मृत्यु और अमरता का रहस्य

यही है


कि मृत्यु

जीवन की सीमा है,


और अमरता

उस सीमा के पार

अर्थ की खोज।


जब मनुष्य

इस सत्य को स्वीकार कर लेता है,

तो मृत्यु

भय का कारण नहीं रहती,


वह

जीवन की गहराई को समझने का

एक द्वार बन जाती है।


और तब

समय की इस विशाल कथा में

मनुष्य समझने लगता है—


कि

मृत्यु अंत नहीं,

बल्कि

अस्तित्व की अनंत यात्रा का

एक शांत मोड़ है।

मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,


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