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Sunday, 8 March 2026

वजूद की धुंध में खड़ा आदमी

वजूद की धुंध में खड़ा आदमी

अपने ही साए को टटोलता है,

जैसे कोई यात्री

कोहरे में रास्ता नहीं,

अपनी पहचान खोज रहा हो।


उसकी आँखों में

अनगिनत सवालों की नमी है

मैं कौन हूँ?

कहाँ से आया हूँ?

और इस अनंत यात्रा में

मेरा ठिकाना कहाँ है?


वह देखता है

कि दुनिया के चेहरे

कितने साफ़ हैं,

पर उसके भीतर

एक गहरा कुहासा फैला है।


नाम है,

पता है,

रिश्तों की भीड़ है

फिर भी कहीं

एक अनकहा खालीपन

उसके भीतर साँस लेता है।


वह सोचता है

कि शायद पहचान

दूसरों की आँखों में मिलेगी,

पर धीरे-धीरे समझता है

वजूद का सच

किसी आईने में नहीं,

किसी नाम में नहीं,

किसी इतिहास में नहीं।


वह तो

उस मौन में जन्म लेता है

जहाँ आदमी

पहली बार

अपने भीतर उतरता है।


और तब

धुंध थोड़ी-सी हटती है,

और आदमी जान पाता है

कि वह खोया नहीं था,

बस

अपने ही भीतर की रोशनी से

अनजान खड़ा था।


मुकेश ,,,,,,,,

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