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Saturday, 21 March 2026

जहाँ नर्तक मिटे, नृत्य रह जाए

 जहाँ नर्तक मिटे, नृत्य रह जाए - (सूफ़ियाना रंग — फ़ना से बक़ा तक)


मैंने

जब आख़िरी बार

अपने नाम को पुकारा

वो मेरी ही आवाज़ में

मुझसे जुदा हो गया…


और फिर

मैंने चक्कर लिया

एक…

दो…

और फिर

गिनती ही खो गई कहीं…


हर घूम में

कुछ गिरता गया

पहले अहं,

फिर चाहतें,

फिर वो भी

जो “मैं” कहलाता था…


यहाँ तक कि

मैं

अपने ही चारों ओर घूमते-घूमते

अपने अंदर गिर पड़ा…


और वहीं,

उस गिरने में

एक उठान थी…


वो जो सूफ़ी कहते हैं

फ़ना

जहाँ मिटना ही मिलना है,

खोना ही पाना है…


और उसी फ़ना की राख से

कुछ और जन्मा

न मैं,

न तुम,

न कोई तीसरा…


बस एक ठहराव

जो बह रहा था,

एक ख़ामोशी

जो गा रही थी…


वो बक़ा था

जहाँ इश्क़

अपने ही रूप में

क़ायम रहता है…


अब

नर्तक कहीं नहीं है

न कोई जिस्म,

न कोई साया…


बस

एक रक़्स है

जो खुद ही दरवेश है,

खुद ही ख़ुदा की तलाश,

और खुद ही

उसका मिलन…


तुम आओ

तो न आओ किसी नाम से,

न किसी रिश्ते से…


बस

एक घूम बनकर आओ

और मिट जाओ

मेरे साथ…


ताकि

एक ऐसा नृत्य जन्म ले

जो हम दोनों से परे हो…


जहाँ

नर्तक मिटे,

और नृत्य रह जाए…


मुकेश  ,,,,,


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