वो स्त्री
बहुत सुन्दर नहीं है
कम से क
दुनिया की नाप-तौल से तो नहीं।
पर उसमें
एक धीमी-सी चमक है
जो अचानक नहीं चौंकाती,
बल्कि धीरे-धीरे
दिल में उतरती चली जाती है।
उसकी आँखें
कभी यूँ लगती हैं
जैसे किसी अनकहे मौसम की
खिड़की हों।
कभी उनमें
सोच की लंबी गलियाँ होती हैं,
जहाँ कोई चुपचाप
अपने ही सवालों के साथ
टहल रहा हो।
और कभी
वे सचमुच
एक शांत झील हो जाती हैं
इतनी शांत
कि उनमें झाँको तो
अपना ही चेहरा
बिना किसी बनावट के
दिखाई दे जाए।
उसकी बाहें
संगमरमर की नहीं हैं,
पर सांवली धूप में
उनमें एक ऐसी नरमी है
कि नज़र
ठहरते-ठहरते
फिसल जाती है।
उसकी उँगलियाँ
किसी मूर्तिकार की
बारीक कारीगरी नहीं,
पर उनमें
एक सधा हुआ अपनापन है
जैसे वे
हर काम को
धीरे-धीरे
ठीक जगह पर रख देना जानती हों।
वो स्त्री
किसी कविता की
पहली पंक्ति नहीं,
जो अचानक चौंका दे।
वो तो
कविता का वह हिस्सा है
जिसे पढ़ते-पढ़ते
अचानक महसूस होता है
कि
खूबसूरती
दरअसल
चेहरे में नहीं,
उस शांति में होती है
जहाँ कोई
अपने होने को
बिना शोर के
जी रहा होता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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