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Saturday, 7 March 2026

कर्म और नियति का गणित

 कर्म और नियति का गणित

समय की किताब में

हर मनुष्य

एक समीकरण की तरह दर्ज है


कुछ ज्ञात,

कुछ अज्ञात,

और कुछ

अब तक अनसुलझे।


इसी समीकरण का नाम है

कर्म और नियति का गणित।


नियति

जैसे प्रारंभिक शर्त हो,

जिसे लेकर

मनुष्य इस संसार में प्रवेश करता है।


जन्म का क्षण,

परिस्थितियों का जाल,

समय की दिशा

सब मानो

पहले से लिखे हुए सूत्र।


पर कहानी

यहीं समाप्त नहीं होती।


क्योंकि

इस समीकरण में

एक और तत्व है


कर्म।


कर्म

वह चल है

जो हर क्षण बदलता है।


मनुष्य का निर्णय,

उसकी इच्छा,

उसकी चेतना


ये सब

नियति के स्थिर अंकों के बीच

नई संख्याएँ जोड़ते रहते हैं।


कभी

एक छोटा-सा कर्म

पूरे परिणाम को बदल देता है,

जैसे किसी समीकरण में

एक नया मान आ जाए।


नियति

मुस्कुराकर देखती है,

जैसे कोई प्राचीन गणितज्ञ

अपने सूत्रों के बीच

एक नई संभावना देख रहा हो।


वह कहती है


“मैंने तुम्हें

एक प्रारंभ दिया है,

पर अंत

तुम्हारे हाथों में भी है।”


इसीलिए

मनुष्य

पूरी तरह बँधा हुआ भी नहीं,

और पूरी तरह स्वतंत्र भी नहीं।


वह

दोनों के बीच

चलता हुआ एक संतुलन है।


कभी

नियति के अंक भारी पड़ते हैं,

और जीवन

पूर्वनिर्धारित मार्गों पर बहने लगता है।


कभी

कर्म की शक्ति

उन अंकों को नया अर्थ दे देती है।


ऋषियों ने कहा


कर्म

बीज है,

और नियति

उस बीज से उगने वाला वृक्ष।


बीज बदल जाए

तो वृक्ष का स्वरूप भी बदल सकता है।


पर मिट्टी,

ऋतु

और समय—

इन सबका भी

अपना गणित होता है।


शायद

कर्म और नियति का रहस्य

यही है


जीवन

कोई स्थिर सूत्र नहीं,

बल्कि

एक चलता हुआ समीकरण है।


जिसमें

हर निर्णय

एक नई संख्या बनकर जुड़ता है,


और समय

धीरे-धीरे

उसका परिणाम लिखता जाता है।


तब मनुष्य समझता है


नियति

केवल बंधन नहीं,

और कर्म

केवल स्वतंत्रता नहीं।


दोनों मिलकर

जीवन का वह गणित बनाते हैं

जिसे हल करते-करते

मनुष्य

अपने ही अस्तित्व का अर्थ खोजने लगता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,

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