विचार और वास्तविकता का संबंध
मनुष्य के भीतर
एक अदृश्य संसार बसता है
विचारों का संसार।
और उसके बाहर
एक विशाल जगत फैला है
वास्तविकता का संसार।
पहली दृष्टि में
ये दोनों
अलग-अलग प्रतीत होते हैं।
एक
मन की खामोश गहराइयों में जन्म लेता है,
और दूसरा
प्रकृति के ठोस रूपों में दिखाई देता है।
पर जब हम
इस संबंध को समझने की कोशिश करते हैं,
तो पता चलता है
इन दोनों के बीच
एक सूक्ष्म सेतु मौजूद है।
विचार
सिर्फ़ कल्पना नहीं होते,
वे
संभावनाओं के बीज होते हैं।
हर आविष्कार
कभी
एक विचार ही था।
पहले
किसी मन में
उड़ने की कल्पना जन्मी,
फिर
आकाश में
विमान दिखाई दिए।
पहले
किसी चेतना में
ज्ञान को दूर तक पहुँचाने का विचार उठा,
और फिर
दुनिया में
संचार के असंख्य माध्यम बन गए।
इस तरह
विचार
धीरे-धीरे
वास्तविकता का रूप लेने लगते हैं।
पर
इस संबंध का दूसरा पक्ष भी है।
वास्तविकता भी
विचारों को जन्म देती है।
जब मनुष्य
प्रकृति को देखता है,
जब वह
जीवन के अनुभवों से गुजरता है—
तो
उसकी चेतना में
नए प्रश्न और नए विचार उत्पन्न होते हैं।
अर्थात
विचार और वास्तविकता
एक-दूसरे के विरोधी नहीं,
बल्कि
एक-दूसरे के सहयात्री हैं।
वास्तविकता
अनुभव देती है,
और विचार
उसे अर्थ देते हैं।
यही कारण है कि
मानव सभ्यता
सिर्फ़ पदार्थ की कहानी नहीं है,
वह
विचारों की यात्रा भी है।
किसी युग में
स्वतंत्रता का विचार जन्म लेता है,
और धीरे-धीरे
वह समाज की वास्तविकता बन जाता है।
किसी समय
न्याय का विचार उठता है,
और वह
कानून और व्यवस्था का रूप ले लेता है।
शायद
विचार और वास्तविकता का असली संबंध
यही है
कि विचार
भविष्य की रूपरेखा होते हैं,
और वास्तविकता
उन रूपरेखाओं का मूर्त रूप।
जब मनुष्य
अपने विचारों को
सजगता और विवेक से दिशा देता है,
तो
वास्तविकता भी
धीरे-धीरे
उसके स्वप्नों के अनुसार
बदलने लगती है।
और तब
चेतना का यह रहस्य
स्पष्ट होने लगता है
कि संसार
केवल वही नहीं है
जो दिखाई देता है,
बल्कि
वह भी है
जो मनुष्य के विचारों में
धीरे-धीरे आकार ले रहा है।
मुकेश ,,,,,,,
No comments:
Post a Comment