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Sunday, 8 March 2026

एक आवाज़ जो अंदर से आती थी,

 एक आवाज़ जो अंदर से आती थी,

बहुत धीमी,

लगभग उतनी ही

जितनी किसी बंद कमरे में

घड़ी की टिक-टिक।


पहले-पहल

मैंने उसे नज़रअंदाज़ किया,

सोचा

यह कोई वहम होगा,

या थके हुए मन की

कोई पुरानी आदत।


लेकिन वह आवाज़

बार-बार लौटती रही

कभी खामोशियों में,

कभी भीड़ के बीच,

कभी आधी रात

नींद की तहों को खोलते हुए।


वह मुझे पुकारती नहीं थी,

बस

मेरे भीतर बैठकर

मेरा इंतज़ार करती थी।


जैसे कोई पुराना दोस्त

दरवाज़ा नहीं खटखटाता,

सिर्फ़ आँगन में

चुपचाप बैठा रहता है।


धीरे-धीरे समझ में आया

वह आवाज़

किसी और की नहीं थी,

वह मेरी ही थी

जिसे मैंने

दुनिया के शोर में

कहीं पीछे छोड़ दिया था।


और जिस दिन

मैंने पहली बार

उसे ध्यान से सुना,

उस दिन लगा

कि शायद

मनुष्य की सबसे सच्ची बातचीत

दुनिया से नहीं,

अपने ही भीतर से होती है


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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