सृजन और विनाश का ब्रह्मांडीय नृत्य
ब्रह्मांड
कोई स्थिर चित्र नहीं है,
वह
एक निरंतर चलती हुई लय है
एक ऐसा नृत्य,
जिसमें
सृजन और विनाश
साथ-साथ कदम मिलाकर चलते हैं।
जब किसी तारे का जन्म होता है,
अंतरिक्ष की निस्तब्धता में
प्रकाश की एक नई धुन बज उठती है।
गैस और धूल के बादल
धीरे-धीरे सिमटते हैं,
और
एक नई अग्नि
आकाश के विशाल मंच पर
अपना स्थान बना लेती है।
यह
सृजन का क्षण है।
पर उसी ब्रह्मांड में
कहीं कोई तारा
अपने अंतिम क्षणों से गुजर रहा होता है।
उसकी ज्वाला
धीरे-धीरे बुझती है,
और एक दिन
वह विस्फोट की तरह
अंतरिक्ष में बिखर जाता है।
यह
विनाश का दृश्य है।
पर गहराई से देखें
तो यह केवल अंत नहीं होता।
उस विस्फोट से
जो तत्व फैलते हैं
वही आगे चलकर
नए तारों, ग्रहों
और जीवन की संभावनाओं का
आधार बनते हैं।
इस प्रकार
विनाश
कभी-कभी
सृजन का ही प्रारंभ बन जाता है।
प्रकृति का यही नियम
धरती पर भी दिखाई देता है।
बीज
मिट्टी में टूटता है,
तभी
एक नया वृक्ष जन्म लेता है।
पुरानी पत्तियाँ झरती हैं,
तभी
नई हरियाली उगती है।
अर्थात
सृजन और विनाश
एक दूसरे के विरोधी नहीं हैं,
वे
एक ही प्रक्रिया के
दो अलग क्षण हैं।
मानव जीवन में भी
यह सत्य छिपा है।
कभी
पुरानी धारणाएँ टूटती हैं,
कभी
पुराने विचार समाप्त होते हैं
तभी
नई समझ
और नई चेतना जन्म लेती है।
शायद
ब्रह्मांड का यह नृत्य
यही सिखाता है
कि परिवर्तन
किसी भी अस्तित्व का
अपरिहार्य नियम है।
जो बनता है
वह एक दिन बदलता भी है,
और जो मिटता है
वह किसी नई संभावना को जन्म देता है।
इस विशाल ब्रह्मांड में
सृजन और विनाश
दो अलग कथाएँ नहीं,
बल्कि
एक ही लय के
दो स्वर हैं।
और इसी लय में
समय,
प्रकृति
और जीवन
अपनी अनंत यात्रा जारी रखते हैं
मानो
अस्तित्व स्वयं
एक अदृश्य संगीत पर
निरंतर नृत्य कर रहा हो।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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