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Wednesday, 11 March 2026

बंद खिड़की के उस पार की दुनिया

 बंद खिड़की के उस पार की दुनिया


कभी-कभी

एक बंद खिड़की

सिर्फ़ लकड़ी और काँच नहीं होती,

वह दो दुनियाओं के बीच

एक चुप खड़ी हुई सीमा होती है।


इस पार

कमरे की स्थिर हवा है,

किताबों की धीमी गंध,

और घड़ी की

धीरे-धीरे गिरती हुई टिक-टिक।


और उस पार

पेड़ों पर चलती हुई हवा है,

बच्चों की दूर से आती हँसी,

और सड़क पर बहता हुआ

जीवन का अनवरत शोर।


मैं अक्सर सोचता हूँ

दुनिया सच में कहाँ है?

उस पार

जहाँ जीवन बह रहा है,

या इस पार

जहाँ मन

अपनी खामोशी में

उसे देख रहा है।


कभी-कभी

हम खिड़की खोल सकते हैं,

पर हर खिड़की

हाथों से नहीं खुलती।


कुछ खिड़कियाँ

मन के भीतर होती हैं,

जिन्हें खोलने के लिए

हवा नहीं,

साहस चाहिए।


और जिस दिन

वह भीतर की खिड़की खुलती है,

उस दिन पता चलता है

कि दुनिया

कभी उस पार नहीं थी,

वह तो हमेशा

हमारी अपनी दृष्टि के

इस पार ही खड़ी थी।


मुकेश ,,,,,,,,,

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