रूह की अधूरी प्यास
रूह की अधूरी प्यास
न किसी दरिया से बुझती है,
न किसी जाम से,
ये तो उस नाम की तलाश है
जिसे लब भूल चुके हैं
मगर दिल अब भी याद करता है।
मैंने शहरों की रौनक में
उसे ढूँढ़ना चाहा,
मगर हर मोड़ पर
सिर्फ़ चेहरे मिले
रूह कहीं नज़र न आई।
फिर एक दिन
तन्हाई की धूल भरी राह पर
चलते-चलते
मुझे अपने ही अंदर
एक सूना कूआँ मिला।
उस कूएँ की तह में
कोई पानी नहीं था,
बस एक पुकार थी
धीमी, मगर गहरी।
वो पुकार कहती थी
"जिसे तू बाहर खोजता है
वो तेरे अंदर का समंदर है।"
तब समझ में आया
कि रूह की प्यास
दुनिया की चीज़ों से नहीं बुझती,
उसे तो बस
एक रौशनी चाहिए—
जो दिल की अँधेरी गुफ़ाओं में
उतरकर
वजूद को जगाए।
और शायद
इसीलिए
इंसान सारी उम्र भटकता है
क्योंकि रूह की अधूरी प्यास
उसे
ख़ुदा तक ले जाने का
सबसे पुराना रास्ता है
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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