मैं अपने अंदर उतरता गया
मैं अपने अंदर
उतरता गया—
जैसे कोई मुसाफ़िर
अँधेरी गुफ़ा में
दीया लेकर चलता है।
हर कदम पर
एक परदा हटता गया,
और मेरे सामने
मेरे ही वजूद की
नई सूरतें खुलती गईं।
कहीं
ख़्वाहिशों का शोर था,
कहीं
अहंकार की दीवारें थीं,
कहीं
बीते लम्हों की धूल
हवा में तैर रही थी।
मैं चलता रहा—
और गहराई में
एक अजीब-सी ख़ामोशी
मेरा इंतज़ार करती मिली।
उस ख़ामोशी में
न कोई सवाल था
न कोई जवाब,
बस एक उजली आहट थी
जो रूह को छू रही थी।
तब लगा
कि सफ़र बाहर का नहीं था,
ये तो
अपने ही भीतर
वापस लौटने का रास्ता था।
मैं अपने अंदर
उतरता गया—
और हर परत के बाद
कुछ न कुछ
पीछे छूटता गया।
आख़िर में
जब सब कुछ
छूट गया—
नाम, चेहरा,
और वजूद की धूल—
तो बस
एक रौशनी बची
जो कह रही थी—
“यही तुम्हारा असली घर है।”
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