पत्थर, पीठ और रज़ा
पत्थर सबको मिले थे
क़िस्मत की राह में बिखरे हुए
कुछ ने उन्हें
ग़ुस्से की तरह उठाया
कुछ ने
दावा समझकर जेब में रख लिया
मुझे भी
पत्थर मिले
पर साथ ही
एक पीठ भी मिली
मैंने सोचा—
शायद यही मेरी अमानत है
मैंने पत्थर नहीं फेंके
उन्हें
पीठ पर रख लिया
पहले दर्द हुआ
फिर आदत
फिर
वह दर्द
ज़िक्र बन गया
मैंने जाना—
जिसे लोग बोझ कहते हैं
वह दरअसल
रज़ा की पहली सीढ़ी है
पत्थर
जब देर तक टिके रहें
तो दिल को तराशते हैं
पीठ
जब शिकायत न करे
तो सजदा बन जाती है
मैं झुका नहीं
पर झुकाव आ गया
मैं टूटा नहीं
पर भीतर
एक दरवेश उतर आया
अब
जो भी पत्थर रखता है
मैं मुस्कुरा देता हूँ
क्योंकि मुझे मालूम है—
पत्थर
हाथ से छूटते हैं
पीठ से नहीं
और जब आख़िरी पत्थर भी
समय की धूल हो जाएगा
तब
मेरी पीठ
ख़ाली नहीं होगी
वहाँ
सिर्फ़ एक सुकून होगा
कि मैंने
फेंकने के बजाय
ढोना चुना।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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