अस्तित्व की मौन व्याख्या
कभी-कभी
सत्य शब्दों में नहीं मिलता,
वह
मौन की गहराइयों में छिपा रहता है।
अस्तित्व
अपने रहस्य को
शोर में नहीं खोलता,
वह
निस्तब्धता की भाषा में
धीरे-धीरे प्रकट होता है।
जब पर्वत
निश्चल खड़े रहते हैं,
जब समुद्र
अपनी गहराई में
अनंत तरंगों को छुपाए रहता है,
तब
प्रकृति मानो
मौन में ही
अस्तित्व का अर्थ कह रही होती है।
मनुष्य
अक्सर शब्दों में
सत्य को पकड़ने की कोशिश करता है।
वह
ग्रंथ लिखता है,
विचारों की व्याख्या करता है,
और
ज्ञान के सूत्र गढ़ता है।
पर जितना अधिक
वह बोलता है,
उतना ही
कभी-कभी
सत्य उससे दूर होता जाता है।
क्योंकि
अस्तित्व का कुछ भाग
ऐसा भी है
जो शब्दों में बँध नहीं सकता।
वह
अनुभूति में आता है,
ध्यान की शांति में झलकता है,
और
मौन के क्षणों में
अपना संकेत देता है।
जब मनुष्य
अपने भीतर की हलचल को
कुछ देर के लिए शांत कर देता है,
जब वह
विचारों की भीड़ से बाहर निकल आता है
तब
उसे महसूस होने लगता है
कि अस्तित्व
किसी तर्क या परिभाषा का विषय नहीं,
बल्कि
एक जीवित अनुभव है।
शायद
अस्तित्व की मौन व्याख्या
यही सिखाती है—
कि जीवन का हर उत्तर
शब्दों में नहीं मिलता।
कुछ उत्तर
आकाश की निस्तब्धता में छिपे होते हैं,
कुछ
नदी की शांत धारा में,
और कुछ
मनुष्य के अपने ही हृदय में।
जब चेतना
इस मौन को सुनना सीख लेती है,
तब
अस्तित्व का रहस्य
धीरे-धीरे खुलने लगता है।
और तब
मनुष्य समझ पाता है—
कि ब्रह्मांड
केवल शब्दों की कथा नहीं,
वह
मौन की उस अनंत व्याख्या का नाम है
जो
हर क्षण
सृष्टि के कण-कण में
निरंतर लिखी जा रही है।
मुकेश ,,,,,,
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