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Wednesday, 18 March 2026

एक रात, एक ख़्वाब, और तुम

 एक रात, एक ख़्वाब, और तुम


एक रात थी

सियाह, गहरी,

ख़ामोशियों में लिपटी हुई।


एक ख़्वाब था—

धीरे-धीरे

पलकों पर उतरता हुआ,

जैसे कोई नर्म रौशनी

अँधेरे को छू रही हो।


और फिर तुम थीं

न जाने कहाँ से आईं,

मगर उस ख़्वाब को

मायने दे गईं।


मैंने तुम्हें

बस एक पल के लिए देखा,

और लगा

पूरी रात

अब मुकम्मल हो गई।


सुबह हुई

तो ख़्वाब बिखर गया

मगर तुम

अब भी कहीं

मेरी यादों में

ठहरी हुई हो…


मुकेश ,,,,,,

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