नींद और जागरण के बीच का शहर
एक शहर है
जो किसी नक्शे में दर्ज नहीं,
न किसी यात्री ने
उसका रास्ता लिखा है।
वह बस
नींद और जागरण के बीच
धीरे-धीरे खुलता है—
जैसे कोई आधा सपना
अभी पूरी तरह टूटा न हो।
उस शहर की गलियों में
सन्नाटा भी चलता है
और यादें भी।
कुछ दरवाज़े
पलकों की तरह आधे खुले रहते हैं।
यहाँ
रात की थकान
अब भी दीवारों से टिकी होती है,
और सुबह
खिड़कियों के काँच पर
अपनी पहली सांस रख रही होती है।
यहीं
सपनों के बचे हुए टुकड़े
मन के आँगन में गिरते हैं,
और बीते हुए दिन
धीरे-धीरे
अपनी परछाइयाँ समेटते हैं।
इस शहर में
कोई भी पूरी तरह जागा हुआ नहीं होता,
कोई पूरी तरह सोया हुआ भी नहीं।
यहाँ
मनुष्य
कुछ देर के लिए
दुनिया से बाहर आ जाता है
और अपने भीतर
एक शांत जगह पर बैठकर
समय को गुजरते हुए देखता है।
शायद
नींद और जागरण के बीच का यही शहर
वह जगह है
जहाँ आदमी
सबसे कम अभिनय करता है
और सबसे ज़्यादा
अपने सच के करीब होता है।
मुकेश ,,,,,,,
No comments:
Post a Comment