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Saturday, 7 March 2026

प्रकाश और अंधकार का संतुलन

 प्रकाश और अंधकार का संतुलन

ब्रह्मांड की सबसे पहली तस्वीर

शायद पूरी तरह रोशन नहीं थी,

और न ही पूरी तरह अँधेरी।


वह एक ऐसा विस्तार था

जहाँ प्रकाश और अंधकार

एक साथ सांस लेते थे।


प्रकाश

वह चिंगारी है

जो चीज़ों को दिखाई देती है

तारों की आग,

सूरज की धूप,

और आँखों में उतरती हुई सुबह।


अंधकार

वह गहराई है

जो सब कुछ अपने भीतर समेटे रहती है

रात की निस्तब्धता,

अंतरिक्ष की खामोशी,

और मनुष्य के भीतर छिपे हुए प्रश्न।


पहली नज़र में

दोनों एक-दूसरे के विरोधी लगते हैं

जैसे एक आए

तो दूसरा मिट जाए।


पर ब्रह्मांड की कथा

कुछ और ही कहती है।


अगर अंधकार न हो

तो प्रकाश दिखाई ही नहीं देगा,

और अगर प्रकाश न हो

तो अंधकार का अर्थ ही खो जाएगा।


तारे

अंधेरे आकाश में ही चमकते हैं,

और भोर

रात की गहराई से ही जन्म लेती है।


यही संतुलन

प्रकृति का सबसे सूक्ष्म नियम है।


मनुष्य के भीतर भी

एक छोटा-सा ब्रह्मांड बसता है

जहाँ आशा का प्रकाश है

और संदेह का अंधकार भी।


कभी ज्ञान

हमारे भीतर दीपक की तरह जलता है,

और कभी

अज्ञान की छाया

हमारे रास्ते को ढक लेती है।


पर शायद

जीवन का उद्देश्य

केवल प्रकाश में जीना नहीं,

बल्कि

अंधकार को समझना भी है।


क्योंकि

अंधकार

सिर्फ़ अभाव नहीं,

वह संभावनाओं की

एक गहरी प्रयोगशाला भी है।


बीज

अंधेरी मिट्टी में ही अंकुरित होता है,

और ध्यान की सबसे गहरी अवस्था

आँखें बंद करके ही आती है।


इस तरह

प्रकाश और अंधकार

दो अलग शक्तियाँ नहीं,


बल्कि

एक ही सृष्टि के

दो पूरक आयाम हैं।


प्रकाश

दिखाता है कि क्या है,


और अंधकार

यह सिखाता है कि

अभी कितना जानना बाकी है।


जब मनुष्य

इन दोनों के बीच संतुलन सीख लेता है,

तब उसके भीतर

एक नया बोध जन्म लेता है


कि जीवन

केवल उजाले का नाम नहीं,

बल्कि

उजाले और छाया के

सुंदर समन्वय का नाम है।


और शायद

ब्रह्मांड का सबसे पुराना रहस्य भी

यही है


कि

प्रकाश और अंधकार

एक-दूसरे के विरोधी नहीं,

बल्कि

एक ही सत्य के

दो शांत स्वर हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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