धर्म और अधर्म का शाश्वत संवाद
सृष्टि के आरम्भ से
एक मौन संवाद चल रहा है
धर्म और अधर्म के बीच।
यह संवाद
कभी शास्त्रों में लिखा गया,
कभी इतिहास के रक्त में,
और कभी
मनुष्य के अंतःकरण की
अदृश्य दीवारों पर।
धर्म
किसी एक ग्रंथ का अध्याय नहीं,
न किसी जाति का स्वामित्व है।
वह तो
चेतना की वह धुरी है
जिस पर
अस्तित्व का संतुलन टिका है।
और अधर्म
सिर्फ़ पाप नहीं,
बल्कि
संतुलन का विचलन है,
जब स्वार्थ
समष्टि पर भारी हो जाता है।
जब शक्ति
संरक्षण के स्थान पर
स्वामित्व बन जाती है,
और बुद्धि
करुणा से अलग हो जाती है—
वहीं से
अधर्म की पहली रेखा खिंचती है।
ऋषियों ने कहा
धर्म कोई आदेश नहीं,
एक संतुलन है।
जैसे पृथ्वी
गुरुत्व और गति के बीच संतुलित है,
वैसे ही समाज
न्याय और करुणा के बीच।
जब यह संतुलन टूटता है
तो इतिहास में
युद्ध जन्म लेते हैं,
और मनुष्य
अपने ही बनाए अंधकार से
लड़ने लगता है।
पर सत्य यह है
धर्म और अधर्म
दो शत्रु नहीं,
बल्कि
चेतना के दो संकेत हैं।
एक बताता है
कि मार्ग सही है,
दूसरा चेतावनी देता है
कि दिशा भटक गई है।
इसलिए
धर्म का सबसे बड़ा मंदिर
कोई स्थापत्य नहीं,
मनुष्य का विवेक है।
और अधर्म का सबसे बड़ा जन्मस्थान
कोई शत्रु नहीं,
भूल गया हुआ विवेक है।
जब मनुष्य
अपने भीतर के न्याय को सुन लेता है,
तो धर्म पुनः प्रकट हो जाता है
और तब
अधर्म
इतिहास की धूल में
एक सीख बनकर रह जाता है।
मुकेश ,,,,,,,
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