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Monday, 9 March 2026

धीमी चमक वाली औरत

 धीमी चमक वाली औरत


वो औरत

किसी तेज़ रोशनी की तरह नहीं

जो आँखों को चौंधिया दे।


वो तो

दीये की लौ जैसी है

धीमी, स्थिर

और अपने छोटे-से घेरे में

अँधेरे को

थोड़ा कम करती हुई।


उसका चेहरा

पहली नज़र में

कोई चमत्कार नहीं करता,

पर उसे देखते-देखते

ऐसा लगता है

जैसे कोई पुराना गीत

धीरे-धीरे

याद आने लगा हो।


उसकी आँखें

कभी किसी अनकहे किस्से की तरह

ठहरी रहती हैं,

और कभी

सोच की गहराई में

इतनी उतर जाती हैं

कि लगता है

वो दुनिया को

थोड़ा अलग ढंग से देखती है।


उसकी मुस्कान

बहुत बड़ी नहीं,

पर उसमें

एक सच्चाई है—

जैसे सुबह की पहली धूप

जो बिना शोर के

खिड़की पर आ बैठती है।


उसकी चाल में

कोई बनावट नहीं,

पर उसमें

एक सधा हुआ आत्मविश्वास है

जैसे कोई नदी

अपना रास्ता

बिना पूछे

खुद बना लेती है।


वो औरत

भीड़ में

अचानक दिखाई नहीं देती,

पर जब चली जाती है

तो लगता है

कमरे में कुछ

कम हो गया है।


शायद

खूबसूरती वही होती है

जो धीरे-धीरे

दिल पर उतरती है,


ठीक

उस औरत की तरह

जिसकी रोशनी

हमेशा

धीमी

पर सच्ची होती है।


मुकेश ,,,,,,,

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