विज्ञान और अध्यात्म का सेतु
मनुष्य
जब पहली बार
आकाश की ओर देखता है,
तो उसके भीतर
दो अलग दिशाओं की यात्राएँ शुरू हो जाती हैं।
एक यात्रा
तर्क और प्रयोग की
जिसे हम विज्ञान कहते हैं।
दूसरी यात्रा
ध्यान और अनुभूति की—
जिसे अध्यात्म कहा गया।
विज्ञान
तारों की दूरी नापता है,
कणों की गति समझता है,
और
ब्रह्मांड के नियम खोजता है।
वह पूछता है
“यह कैसे होता है?”
अध्यात्म
उसी ब्रह्मांड को
भीतर की आँख से देखता है।
वह पूछता है
“यह क्यों है?”
एक
बाहर की दुनिया का मानचित्र बनाता है,
दूसरा
भीतर की चेतना का।
पहली नज़र में
दोनों अलग रास्ते लगते हैं
जैसे दो यात्री
विपरीत दिशाओं में चल रहे हों।
पर जब यात्रा लंबी होती है,
तो धीरे-धीरे
उनके रास्ते
एक ही क्षितिज की ओर मुड़ने लगते हैं।
विज्ञान कहता है
सारा ब्रह्मांड
ऊर्जा और कणों की एकता है।
अध्यात्म कहता है
सारा अस्तित्व
एक ही चेतना का विस्तार है।
भाषाएँ अलग हैं,
पर संकेत
कभी-कभी
एक ही सत्य की ओर इशारा करते हैं।
विज्ञान
दूरबीन से आकाश को पढ़ता है,
अध्यात्म
ध्यान से आत्मा को।
पर दोनों की जिज्ञासा
एक ही है
सत्य को जानना।
इतिहास में
कभी दोनों के बीच
दीवारें भी खड़ी हुईं,
कभी बहसें भी हुईं।
मगर समय ने
धीरे से यह भी बताया
कि
सत्य इतना विशाल है
कि उसे समझने के लिए
तर्क भी चाहिए
और अनुभूति भी।
विज्ञान
हमें बताता है
कि ब्रह्मांड कैसे काम करता है,
और अध्यात्म
यह पूछता है
कि उस ब्रह्मांड में
हमारा अर्थ क्या है।
जब दोनों
एक-दूसरे को नकारते नहीं,
बल्कि
समझने की कोशिश करते हैं
तभी
एक अद्भुत सेतु बनता है।
उस सेतु पर खड़ा मनुष्य
आकाश की ओर भी देख सकता है
और
अपने भीतर की गहराई में भी उतर सकता है।
शायद
विज्ञान और अध्यात्म का असली सेतु
यही है
जहाँ
ज्ञान की रोशनी
और
अनुभूति की शांति
एक साथ चलती हैं।
और तब
मनुष्य समझने लगता है
कि
ब्रह्मांड का रहस्य
सिर्फ़ बाहर नहीं,
उसके अपने भीतर भी
उतनी ही गहराई से मौजूद है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,
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