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Sunday, 31 May 2026

धुएँ का हमनशीं

 

धुएँ का हमनशीं

(फ़िराक़ गोरखपुरी और सिगरेट — एक काल्पनिक कथा)

इलाहाबाद की एक ख़ामोश शाम थी।

सर्दियों का मौसम अपने पूरे शबाब पर था। सिविल लाइन्स की सड़कों पर धुँध का एक महीन-सा परदा पड़ा हुआ था और कॉफ़ी हाउस की खिड़कियों से छनकर आती रौशनी फ़ज़ा में किसी ख़्वाब की तरह तैर रही थी।

एक कोने की मेज़ पर फ़िराक़ साहब तन्हा बैठे थे।

सामने चाय का प्याला था, जिसकी सतह से अब भी हल्की-हल्की भाप उठ रही थी, और उँगलियों में दबी हुई सिगरेट अपने वजूद को धीरे-धीरे धुएँ में तब्दील कर रही थी।

फ़िराक़ ने एक लम्बा कश लिया।

धुआँ ऊपर उठा, कुछ देर छत के नीचे ठहरा और फिर जाने किस जानिब रवाना हो गया।

"आज बड़े ख़ामोश मालूम होते हो, फ़िराक़ मियाँ।"

उन्होंने चौंककर इधर-उधर देखा।

आवाज़ कहीं से नहीं आई थी।

सिवाय उस सिगरेट के, जो उनकी उँगलियों में जल रही थी।

फ़िराक़ मुस्कुराए।

"ख़ामोशी भी कभी-कभी गुफ़्तगू करती है, दोस्त।"

सिगरेट हँसी।

"और तुम्हारी गुफ़्तगू अक्सर किसी न किसी हसीना से शुरू होकर इन्सानियत पर ख़त्म होती है।"

फ़िराक़ ने गर्दन झुकाकर मेज़ पर उँगली से कुछ लकीरें बनाईं।

"मोहब्बत अगर सिर्फ़ एक चेहरे तक महदूद रह जाए तो फिर वो मोहब्बत नहीं रहती।"

"तो क्या रहती है?"

"इन्सान को इन्सान से जोड़ने वाली सबसे बड़ी ताक़त।"

कुछ देर दोनों ख़ामोश रहे।

बाहर शाम गहराती जा रही थी।

अन्दर धुआँ।

और धुएँ के उस पार फ़िराक़ का चेहरा ऐसा लग रहा था जैसे किसी पुराने शेर की आख़िरी गिरह अभी खुलने वाली हो।


नज़्म

(फ़िराक़ के रंग से प्रेरित, मौलिक)


रात की शाख़ से इक ख़्वाब गिरा था शायद,

दिल के वीरान मकानों में सदा थी शायद।

मैं जिसे याद समझता रहा बरसों-बरस,

वो  मेरे ज़ेहन की तन्हा-सी हवा थी शायद।

तेरे जाने का कोई ग़म तो नहीं था लेकिन,

उम्र भर दिल में कोई बात बची थी शायद।

धुआँ उठता रहा ख़ामोश चराग़ों की तरह,

और उस धुएँ में मेरी ही सदा थी शायद।


फ़िराक़ साहब ने काग़ज़ मोड़ा, जेब में रखा और उठ खड़े हुए।

सिगरेट अब आख़िरी कश तक पहुँच चुकी थी।

"चलूँ?" उन्होंने पूछा।

"कहाँ?"

सिगरेट ने मुस्कुराकर कहा।


फ़िराक़ ने दरवाज़े की तरफ़ बढ़ते हुए जवाब दिया

"किसी नई तन्हाई की तलाश में।"

और फिर कॉफ़ी हाउस के दरवाज़े के बाहर, इलाहाबाद की सर्द हवा में, एक शायर और उसका धुआँ देर तक साथ-साथ चलते रहे।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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