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Friday, 1 May 2026

अंदर से बंद दरवाज़ा

 अंदर से बंद दरवाज़ा

वह दरवाज़ा
बाहर से साधारण लगता था—
लकड़ी, कुंडी, एक पुराना-सा हैंडल,
जैसे किसी भी घर का हो।

पर फर्क इतना था
कि वह भीतर से बंद था।

मैंने दस्तक दी—
धीरे, फिर ज़ोर से,
फिर इंतज़ार किया
कि कोई आकर खोलेगा।

अंदर से
कोई आवाज़ नहीं आई।

कभी-कभी लगा
शायद कोई है ही नहीं,
फिर लगा
शायद कोई है—
जो खुलना नहीं चाहता।

अंदर से बंद दरवाज़े
हमेशा ताले से नहीं बंद होते,
वे बंद होते हैं
विश्वास के टूटने से,
थकान से,
या उस एक क्षण से
जब किसी ने तय किया
कि अब और नहीं।

मैंने कान लगाकर सुना—
अंदर हल्की-सी हरकत थी,
जैसे कोई
अपनी ही चुप्पी में चलता हो।

पर उसने दरवाज़ा नहीं खोला।

शायद
हर अंदर से बंद दरवाज़े के पीछे
कोई कैद नहीं होता,
कभी-कभी
वह किसी का
आख़िरी बचा हुआ सुकून होता है।

और बाहर खड़ा व्यक्ति—
वह सिर्फ़ इंतज़ार कर सकता है,
या लौट सकता है
अपने ही भीतर।

क्योंकि
कुछ दरवाज़े
ज़बरदस्ती नहीं खुलते—
वे खुलते हैं
जब भीतर वाला
फिर से भरोसा करना सीख ले।

शायद
दरवाज़े का खुलना
हाथ की ताक़त से नहीं,
मन की अनुमति से होता है।

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