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Sunday, 7 June 2026

दुख की भी एक सुगन्ध होती है,

 दुख की भी एक सुगन्ध होती है,

जो बिना दस्तक के भीतर उतर आती है।
ना वह बोलती है, ना शोर करती है,
बस साँसों के बीच ठहर जाती है।
कभी वह पुराने तकिए से उठती है,
कभी आधे जले हुए दीये से,
और धीरे-धीरे मन को अपने रंग में रंग देती है।
सूफ़ी कहते हैं—यह भी एक इबादत है,
जहाँ आँसू सजदा बन जाते हैं,
और चुप्पी खुदा से बातचीत।

मुकेश ,,,,,

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