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Sunday, 7 June 2026

रात जब गहरी होती है,

 रात जब गहरी होती है,

तो उसकी भी एक गन्ध होती है—
भीगी हुई दुआओं जैसी,
और अधूरी प्रार्थनाओं जैसी।
दीवारें भी उस गन्ध को समझती हैं,
और खामोश होकर सुनती हैं उसे।
सूफ़ी फकीरों की तरह रात
अपने भीतर एक राज़ छुपाए रखती है,
जो सुबह होने तक रोशनी नहीं बनता,
बस इंतज़ार बनकर बहता रहता है।

मुकेश ,,,,,

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