रूहानी सफ़र की गन्ध
रूहानी सफ़र की कोई दिशा नहीं होती,
उसकी एक अलग ही गन्ध होती है।
कभी वह बारिश से आती है,
कभी रेगिस्तान की धूप से।
हर कदम पर एक नया एहसास खुलता है,
और पुराना “मैं” पीछे छूट जाता है।
सूफ़ी मुसाफ़िर जानते हैं कि
हर रास्ता अंत में उसी एक दरवाज़े तक जाता है,
जहाँ गन्ध भी नहीं रहती
सिर्फ़ मौन रह जाता है।
मुकेश ,,,,,
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