“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है
जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है
और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक
▼
Wednesday, 1 February 2012
कौन कहता है मुहब्बत ज़माने में नहीं बाकी
बैठे ठाले की तरंग -------------------------------
कौन कहता है मुहब्बत ज़माने में नहीं बाकी वरना आप हमसे और हम आपसे रूबरू न होते
------------------------------------मुकेश इलाहाबादी
No comments:
Post a Comment