“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है
जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है
और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
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Tuesday, 17 July 2012
चिरकाल तक तुम्हे याद करते हुए
चिरकाल तक तुम्हे याद करते हुए
बैठा रह सकता हूँ
चट्टान बन जाने की हद तक
इंतज़ार के अनंत युगों तक
धूप, छांह, अंधड़, पानी सहते हुए
बिखर सकता हूँ
बह जाने को नदी नाले से होते हुए
नीले समुद्र मे
रेत बन कर
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