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Sunday, 14 July 2013

जिंदगी तुझे अब ढूंढने कंहा जायें

जिंदगी तुझे अब ढूंढने कंहा जायें
अजनबी शहर है घूमने कहां जायें

समन्दर,झील,दरिया सब उथले हैं
ऑख बिन पानी डूबने कहां जायें

तुम भी रहते हो खफा, मनाते नही
छोड़ कर तुम्हे हम रुठने कहां जायें

सारे सावन विदा हो गये, तुमने भी
बाहें सिकोड ली है झूलने कहां जायें

वो अलग दौर था पी के बहकने का
अब पी भी लें तो झूमने कहां जायें

मुकेश  इलाहाबादी .................

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